आज जब इस बड़े से शहर में ९ वी मंजिल पे बैठ , सड़क पर की दुनिया को देखता हूँ और पाता हूँ सड़क के एक और मॉल है जहाँ देर रात तक रौशनी रहती है , और दूसरी और एक चाय वाला आधी फटी कम्बल में अपने एक साल के बच्चे को लेकर सर्द रात में सोया है . सड़क के इस पर, उस पार अपने अपने हिस्से के भाव अभाव हैं।
मैं इस शहर में सड़क के दोनों तरफ को जीता हूँ। ना अपना गांव छोड़ पाया हूँ , ना ही "अज्ञेय " का शहरी सभ्य हो पाया हूँ. हाँ , थोड़ा हिप्पोक्रेट जरूर हो गया हूँ, अपनी कमजोरियों को छुपाने के लिए !
ये कौन सा अभाव है जो मेरे भाव के साथ चलता है। शायद अच्छा नहीं लगता है मुझे अकेले का बढ़ना. कभी कभी लगता है , मेरे एयर कंडिशन्ड कमरे मुझे चिढ़ाते हैं , शायद वो "गाछी का मचान " ज्यादा सुखमय रहा है। अपने बचपन की गरीबी पे कभी अफ़सोस नहीं रहा मुझे , ख़ुशी है की तथाकथित डिग्रियों और सफलताओं के बीच भी इंसान ज्यादा बन पाया , बुद्धिजीवी कम !
कोशिश मेरी यही है की आज के भाव में बीते हुए कल का अभाव नहीं छूट जाये.
सफर चलता रहे , कारवां बनता रहे !
मैं इस शहर में सड़क के दोनों तरफ को जीता हूँ। ना अपना गांव छोड़ पाया हूँ , ना ही "अज्ञेय " का शहरी सभ्य हो पाया हूँ. हाँ , थोड़ा हिप्पोक्रेट जरूर हो गया हूँ, अपनी कमजोरियों को छुपाने के लिए !
ये कौन सा अभाव है जो मेरे भाव के साथ चलता है। शायद अच्छा नहीं लगता है मुझे अकेले का बढ़ना. कभी कभी लगता है , मेरे एयर कंडिशन्ड कमरे मुझे चिढ़ाते हैं , शायद वो "गाछी का मचान " ज्यादा सुखमय रहा है। अपने बचपन की गरीबी पे कभी अफ़सोस नहीं रहा मुझे , ख़ुशी है की तथाकथित डिग्रियों और सफलताओं के बीच भी इंसान ज्यादा बन पाया , बुद्धिजीवी कम !
कोशिश मेरी यही है की आज के भाव में बीते हुए कल का अभाव नहीं छूट जाये.
सफर चलता रहे , कारवां बनता रहे !